वह सलाह आज बुरी क्यों लगने लगी
चाय की दुकान पर दस साल का एक बच्चा हाथ में गिलास लिए इधर-उधर दौड़ रहा था। कभी चाय परोसता, कभी जूठे बर्तन धोता। पास ही एक दूसरा बच्चा साइकिल की दुकान पर पंचर बना रहा था।
दोनों की उम्र खेलने और स्कूल जाने की थी, लेकिन उनके हाथों में किताबों की जगह मेहनत के औजार थे।
किसी ने बच्चे से स्कूल के बारे में पूछा तो उसने मासूमियत से कहा—
“पिताजी कहते हैं कि पढ़कर क्या होगा, काम करो और पैसे कमाओ।”
उस छोटे से बच्चे को क्या पता था कि वह अपने जीवन का निर्णय स्वयं नहीं ले रहा है। वह तो केवल वही कर रहा था, जो उसके पिता ने उसे बताया था।
दस साल की उम्र में बच्चे के पास इतना अनुभव नहीं होता कि वह अपने भविष्य का रास्ता चुन सके। उसके लिए पिता की बात ही दुनिया की सबसे बड़ी सच्चाई होती है।
एक पिता ने अपने बच्चे की छोटी-सी कमाई को महत्व दिया और उसके हाथ से किताब छीनकर काम पकड़ा दिया। धीरे-धीरे उसका बचपन खत्म हो गया।
लेकिन उसी दुनिया में एक दूसरा पिता भी था।
घर में अभाव था। कभी फीस की चिंता होती, कभी किताबों की। फिर भी उसने अपने बच्चे से कहा—
“तुम अभी छोटे हो। तुम्हारा काम कमाना नहीं, सीखना है। मेरी परिस्थितियाँ तुम्हारा भविष्य तय नहीं करेंगी।”
उस पिता ने अपनी इच्छाएँ कम कीं, जरूरतें रोकीं और बच्चे की शिक्षा को प्राथमिकता दी। उसने केवल पढ़ाया ही नहीं, बल्कि संस्कार दिए, सही और गलत का अंतर समझाया और जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।
समय बीत गया।
बच्चा बड़ा हुआ। पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ। उसके पास अच्छा घर था, अच्छी नौकरी थी और जीवन में सुख-सुविधाएँ थीं।
लेकिन सफलता के साथ कभी-कभी मनुष्य उन सीढ़ियों को भूल जाता है, जिन पर चढ़कर वह ऊपर पहुँचा होता है।
एक दिन पिता ने बेटे को जीवन से जुड़ी कोई सलाह दी। बेटे ने झुंझलाकर कहा—
“पिताजी, आपकी बातें पुराने जमाने की हैं। आज का समय बदल गया है। आपने आखिर हमारे लिए किया ही क्या है।”
पिता कुछ देर शांत रहे।
फिर उन्होंने अपने तीनों बेटों को पास बुलाया।
उनकी आँखों में नाराजगी नहीं थी, केवल वर्षों के त्याग की नमी थी।
पिता ने धीरे से कहा—
“जब तुम दस साल के थे, तब तुम्हारे पास अपने जीवन का निर्णय लेने की न तो उम्र थी, न अनुभव और न ही समझ। उस समय तुम्हारे जीवन का निर्णय मुझे लेना था। मैंने जो निर्णय लिया, वह अपने लिए नहीं, तुम्हारे भविष्य के लिए लिया था।”
पिता की आवाज थोड़ी भर्रा गई।
“मैंने तुम्हें पढ़ाया, तुम्हें संस्कार दिए, तुम्हें गलत रास्तों से बचाने की कोशिश की। तुम्हारी जरूरतों के लिए अपनी जरूरतें छोड़ीं। तुम्हारी खुशियों के लिए अपनी इच्छाएँ दबाईं। क्योंकि मैं चाहता था कि एक दिन तुम अपने पैरों पर खड़े होकर वह जीवन जी सको, जो मैं तुम्हें दे नहीं पाया।”
कुछ पल की खामोशी के बाद पिता ने कहा—
“बस इतना याद रखना, जब तुम दस साल के थे तब तुम्हारे लिए मेरी सलाह अच्छी थी। उसी सलाह और उसी अनुशासन ने तुम्हें आज इस मुकाम तक पहुँचाया। फिर आज वही बात तुम्हें पुरानी और बुरी क्यों लगने लगी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
बेटे की आँखें भर आईं।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि पिता की डाँट के पीछे कठोरता नहीं, चिंता थी। उनकी रोक-टोक के पीछे बंधन नहीं, सुरक्षा थी। उनकी सलाह में पुरानापन नहीं, जीवन का अनुभव था।
उसे यह भी समझ आया कि पिता ने उसके हाथ में केवल किताब नहीं रखी थी, बल्कि अपने जीवन का एक हिस्सा रख दिया था।
बच्चे अक्सर माता-पिता की दी हुई सुविधाएँ याद रखते हैं, लेकिन उनके पीछे छिपे त्याग को भूल जाते हैं।
पिता ने अपने बच्चों को केवल बड़ा नहीं किया था।
उन्होंने अपने सपनों को छोटा करके बच्चों के सपनों को बड़ा किया था।
और शायद यही पिता की सबसे बड़ी विडंबना है—
जब बच्चे छोटे होते हैं, तो पिता की बात उनके लिए रास्ता होती है।
जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो वही रास्ता उन्हें अपना बनाया हुआ लगता है।
इसलिए माता-पिता की हर बात मानना जरूरी नहीं, लेकिन उनकी नीयत और उनके त्याग को समझना जरूर जरूरी है।
क्योंकि—
जिस पिता ने तुम्हें चलना सिखाया,
उसके कदमों को कमजोर समझने से पहले
उस रास्ते को याद कर लेना,
जिस पर चलकर तुम यहाँ तक पहुँचे हो।
लेखक — आलोक रंजन त्रिपाठी
ज्योतिष एवं वास्तु विशेषज्ञ, इन्दौर
मोबाइल — 8319482309
ब्लॉग — alokranjantripathi.in
“जिस पिता की सलाह ने तुम्हारा भविष्य बनाया, वही सलाह आज तुम्हें पुरानी क्यों लगने लगी।”
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