प्राचीन कवियों को राजहंस से इतना लगाव क्यों था?
प्राचीन कवियों को राजहंस में एक साथ तीन बातें मिलती थीं, जो किसी और पक्षी में नहीं मिलती थीं।
पहला है नीर-क्षीर विवेक। कहा जाता है कि राजहंस में दूध और पानी मिले होने पर भी सिर्फ दूध पी लेने की क्षमता है। ये बात सच में जीव विज्ञान से ज्यादा कविता है, पर कवियों के लिए ये सबसे सुंदर रूपक बन गया। नीर मतलब बुराई, भ्रम, झूठ और क्षीर मतलब सच्चाई, ज्ञान। तो राजहंस वो ज्ञानी व्यक्ति बन गया जो दुनिया में रहकर भी सही-गलत को पहचान लेता है।
इसी से दूसरा गुण जुड़ता है - निर्लेपता। जैसे हंस पानी में रहता है पर उसके पंख गीले नहीं होते, वैसे ही संत या मुक्त आत्मा संसार के मोह-माया में रहकर भी लिप्त नहीं होती। कबीर इसीलिए कहते हैं - हंस उड़ा आकाश को, कागा भया उदास। यहाँ हंस मुक्त आत्मा है और कागा मोह में फंसा मन।
तीसरा कारण है उसकी पवित्रता और गरिमा। राजहंस को ब्रह्मा और ज्ञान की देवी सरस्वती का वाहन माना गया है। उसकी सफेद रंगत, शांत चाल और लंबी उड़ान - मानसर तक जाने की कल्पना - उसे राजसी, शुद्ध और सुंदर बनाती है। कालिदास ने तो मेघदूत में इसी हंस को प्रेमियों का संदेश ले जाने वाला दूत तक बना दिया।