📖 पुस्तक : सनातन की धरती
अध्याय – 1
भूमि : जहाँ से सनातन चेतना का उदय हुआ
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प्रस्तावना : धरती और चेतना का अद्भुत संबंध
धरती केवल मिट्टी का विस्तार नहीं होती।
वह स्मृतियों की गोद होती है।
संस्कारों की शिला होती है।
सभ्यताओं की जन्मस्थली होती है।
कुछ भूमि ऐसी होती हैं
जहाँ मनुष्य केवल जीता नहीं,
जागता है।
भारत ऐसी ही भूमि है —
सनातन की धरती।
यहाँ पर्वत ध्यान में हैं,
नदियाँ मंत्र गुनगुनाती हैं,
वन तपस्या करते हैं,
और आकाश ज्ञान का साक्षी बनकर फैला है।
यहीं से मानवता ने
पहली बार आत्मा को पहचाना।
यहीं से चेतना ने
अमर होने का अनुभव किया।
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सनातन का अर्थ : जो समय से परे है
‘सनातन’ शब्द का अर्थ है —
जो न आदि से बँधा है,
न अंत से सीमित।
जो सत्य हर युग में एक सा रहता है —
वही सनातन है।
यह कोई धर्म विशेष नहीं,
यह जीवन का शाश्वत विज्ञान है।
ऋषियों ने इसे खोजा नहीं —
इसे अनुभव किया।
जब विश्व प्रकृति के रहस्यों से अनजान था,
तब भारत के मनीषी
सृष्टि की धड़कन सुन रहे थे।
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ऋषि परंपरा : विचारों की प्रथम प्रयोगशाला
भारत की महानता
राजाओं से नहीं,
ऋषियों से प्रारंभ होती है।
हिमालय की गुफाओं में
प्रथम विश्वविद्यालय बने।
जहाँ परीक्षा नहीं,
अनुभव ही प्रमाण था।
ऋषि विज्ञान खोज रहे थे —
अग्नि, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी —
पंचतत्व का ज्ञान।
वे शरीर को प्रयोगशाला,
मन को उपकरण,
आत्मा को साक्षी बनाते थे।
आज का आधुनिक विज्ञान
उसी ज्ञान को
सिद्ध करने में लगा है।
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वेद : मानवता की प्रथम पुस्तक
वेद शब्द का अर्थ है —
ज्ञान।
ऋषियों ने कहा —
ज्ञान मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है।
ऋग्वेद के मंत्र
प्रकृति से संवाद हैं।
यजुर्वेद कर्म का विज्ञान है।
सामवेद ध्वनि की शक्ति है।
अथर्ववेद जीवन का रहस्य है।
यह मानवता का
पहला ज्ञानकोश है।
जब विश्व निरक्षर था,
तब भारत में
ज्ञान मौखिक परंपरा से
पीढ़ियों तक सुरक्षित था।
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नदियाँ : बहती हुई संस्कृति
भारत की नदियाँ
सिर्फ जलधारा नहीं,
जीवित सभ्यता हैं।
गंगा, यमुना, नर्मदा, सरस्वती, गोदावरी —
ये नदियाँ केवल शरीर को नहीं,
आत्मा को शुद्ध करती हैं।
नदी के किनारे
नगर बसे,
ग्राम विकसित हुए,
संस्कृति पनपी।
नदी भारत की
सांस्कृतिक नस है।
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गुरुकुल : शिक्षा का मूल स्वरूप
भारत में शिक्षा
व्यवसाय नहीं,
साधना थी।
गुरुकुल में
धन नहीं,
चरित्र का निर्माण होता था।
शिष्य सेवा से सीखता था।
ज्ञान गुरु से नहीं,
जीवन से प्राप्त होता था।
यह शिक्षा
जीवन को संपूर्ण बनाती थी।
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धर्म : जीवन व्यवस्था
पश्चिम ने धर्म को
ईश्वर-पूजा तक सीमित किया।
भारत ने धर्म को कहा —
जीवन को धारण करने वाली शक्ति।
धर्म का अर्थ है —
संतुलन, कर्तव्य, करुणा, सत्य।
राजा भी धर्म से बंधा था।
गरीब भी धर्म से सुरक्षित था।
यही कारण है कि
भारत हजारों वर्षों तक
सांस्कृतिक रूप से अजेय रहा।
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योग और ध्यान : आत्मा का विज्ञान
भारत ने शरीर को
आत्मा की प्रयोगशाला बनाया।
योग से शरीर स्वस्थ।
ध्यान से मन शुद्ध।
समाधि से आत्मबोध।
आज जब विश्व
मानसिक रोगों से जूझ रहा है,
तब भारत का योग
मानवता का वरदान बन रहा है।
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संस्कृति : उत्सवमयी जीवन
भारत में
जीवन उत्सव है।
जन्म, विवाह, ऋतु परिवर्तन,
फसल, दीपावली, होली, नवरात्र —
हर अवसर
जीवन की पूजा है।
यह संस्कृति
मनुष्य को
आनंद से जोड़ती है।
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आक्रमण और अस्तित्व
इतिहास ने भारत को
कई बार तोड़ा।
आक्रमण हुए।
मंदिर टूटे।
ग्रंथ जले।
गुरुकुल नष्ट हुए।
पर एक बात नहीं टूटी —
सनातन चेतना।
भक्ति संतों ने
आत्मा को बचाया।
लोक परंपराओं ने
संस्कृति को जीवित रखा।
भारत गिरा नहीं —
भारत झुका, टूटा नहीं।
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स्वतंत्रता और आत्मस्मृति
1947 में
भारत स्वतंत्र हुआ।
पर राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद
सांस्कृतिक स्मृति कमजोर हुई।
हमने पश्चिम का अनुकरण किया।
हम अपनी जड़ों से दूर हुए।
अब समय है —
आत्मस्मरण का।
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नवभारत : परंपरा और प्रगति का संगम
आज भारत
प्रौद्योगिकी में आगे है।
चंद्रयान चाँद पर है।
डिजिटल भारत विकसित है।
पर यदि तकनीक में
संस्कार न हों,
तो विकास अधूरा है।
नवभारत का मार्ग है —
परंपरा + प्रगति।
यही सनातन की धरती का
भविष्य है।
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अध्याय निष्कर्ष
भारत केवल देश नहीं।
यह चेतना है।
यह संस्कार है।
यह शाश्वत सत्य है।
जिस दिन भारत
अपनी सनातन चेतना को
पूरा पहचान लेगा,
उस दिन विश्व
फिर भारत से मार्ग पूछेगा।
और तब
सनातन की धरती
फिर विश्वगुरु बनेगी।
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✍️ लेखक
आलोक रंजन त्रिपाठी
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